मौसम जब-जब उदासी का आता है.
शून्य सी एक नीरवता छाने लगती है..
तन में, मन में, जीवन में हर ओर...
जैसे अम्लता चढ़ जाती है सीने में..
शुरू होती है हिचकी और उठती है एक हूक सी...
जर्रे-जर्रे सी बिखरी जिंदगी हर शाम को,
सुरमई प्याले में एक अनबूझ सवाल छोड़ देती है.
सुबह उगते सूरज के साथ सयाने लोगों की...
शुरू होती है न रुकने वाली दिन-भर की भाग-दौड़,
सपनो में अपनों के बीच पनपती है एक प्यास..
जो वल्लरी सी बन कर मन के जिस्म पर लिपट जाती है
ख्यालों में, रात की चाँदनी में, तारों का यूँ टिमटिमाना,
पलकों का कांपना, बार-बार उठना-गिरना
दो बूंद समुंदर के नमकीन पानी का रिस जाना..
होठों के किनारों पर बनते फेन और माथे की सलवटें
इन सवालों से इनका रिश्ता पुराना है..
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-सुनील कुमार दुबे 17 अक्टूबर 2015