शनिवार, 17 अक्टूबर 2015

सवालों के रिश्ते

मौसम जब-जब उदासी का आता है.
शून्य सी एक नीरवता छाने लगती है..
तन में, मन में, जीवन में हर ओर...
जैसे अम्लता चढ़ जाती है सीने में..
शुरू होती है हिचकी और उठती है एक हूक सी...
जर्रे-जर्रे सी बिखरी जिंदगी हर शाम को,
सुरमई प्याले में एक अनबूझ सवाल छोड़ देती है.

सुबह उगते सूरज के साथ सयाने लोगों की...
शुरू होती है न रुकने वाली दिन-भर की भाग-दौड़,
सपनो में अपनों के बीच पनपती है एक प्यास..
जो वल्लरी सी बन कर मन के जिस्म पर लिपट जाती है
ख्यालों में, रात की चाँदनी में, तारों का यूँ टिमटिमाना,
पलकों का कांपना, बार-बार उठना-गिरना 
दो बूंद समुंदर के नमकीन पानी का रिस जाना..
होठों के किनारों पर बनते फेन और माथे की सलवटें
इन सवालों से इनका रिश्ता पुराना है..
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-सुनील कुमार दुबे 17 अक्टूबर 2015

रविवार, 10 मई 2015

यूँ ही एकांत मन से..

"सुबह की खिली रंगत में शाम का हुनर नज़र आता है.
उनके हर लफ्ज़ से जमीन और निगाह से आसमान नज़र आता है.."
"उनकी पेशानी पे जो दाग हैं, शायद सजदे के हैं.
हमें तो उस दाग में भी चाँद नज़र आता है.."
"मुल्क उनका यह भी है और वो भी था..
जहाँ से उनका बिस्तर उठ के सरे राह शहर आता है."
"क़त्ल उनका सफाई से किया गया होगा शायद..
इसीलिए उनके ऐतबार में भी, पैबंद नज़र आता है.."
"हमने आसमानी रौशनी से क्या खूब, बहार पायी है..
अब ये नीम अँधेरा भी हमें क्यों कर डराता है..."
"रास्ते हँसते हैं हम पर, पर मौज में हम भी हैं साहिल.
किनारा जर्रा है, तू भी, क्यों आज शरमाता है..."
"वक़्त उनका बदला है तो क्या, वो भी तो बदले होंगे थोडा सा..
इस खानाबदोश हया से, आज क्यों जी मेरा घबराता है."
"सर पर तकिया मिले न मिले, मंजर से एहतियात है मेरा..
इस जामीने शौक से, ये 'सरार' क्यों बावस्ता है.."
-सुनील 'सरार' भारद्वाज

गुरुवार, 5 फ़रवरी 2015

तपता

कवि जैसी कल्पनाओं से बाहर निकल.
यूँ धूप से बच के, अलक की बूँद सा.
कुछ तप्त-मन में नमी से रीझा हुआ मन.
रे बावरे, तू क्यों उदास है.?

हर तरफ छाँव पर ये घनी आकुल.
गुल्लकें भरता रहा, किलकारियों सा.
पटल पे मन फिर भी अग्नि सी तपन..
रे बावरे, तू क्यों उदास है.?
- सुनील कुमार दुबे
   05 फ़रवरी 2015 

बुधवार, 21 जनवरी 2015

"सुराज आया"

जब पथिक ने, राह में, निःश्वास लेकर,
आह भर कर, शीश सीने पे झुकाया.

पिघले हुए से, शब्द कानो में पड़े ज्यों,
रात की पहले प्रहर में, सुराज आया.

सुराज आया, सुराज आया, सुराज आया.....(1)

सप्तरंगी हिमधनुष से, आखेट करने,
सहम कर, पग धरा पर, धर को आतुर.

भोर में, कलियों के पीछे, तितलियों सा.
वक्त के आगे से फिसला, पैगाम आया.

सुराज आया, सुराज आया, सुराज आया.....(2)

हीम-शीतित, इस धरा पर सुप्त मानव.
लोक नायक, कुछ झुका पर शीश ताने.

एक लकड़ी से सहारा बुन रहा वो.
संकल्प सा उसने किया जो, ले उठाया.

सुराज आया, सुराज आया, सुराज आया.....(3)

दिग-दिगन्तर, नभ-चिरंतर हाय ये क्या ?
निर्जला वो पलक भीगी, कंठ में आवेश भर कर.

एक पताका, स्वर्ण पाती, नाद में आकाश भर कर.
वह मनुज था, दीन सी उसकी थी काया.
सुराज लाया, सुराज लाया, सुराज लाया......(4)

-सुनील कुमार दूबे.
दिनांक..21 जनवरी 2015