रविवार, 1 जून 2014

एक शुरुआत करनी है,
पुनुरुद्धार और नवनिर्माण की,
नवचेतना के अक्षत स्पंदन की,
अकुलाये और अधीर मन के व्यथित भाव से उत्पन्न
तरंगों के सम्प्रेषण की..

फिर चाहे शून्य से संगम हो
अंतरिक्ष में विचरण हो
मानव मन से ऊष्ण, रुष्ट तटबंधन हो
गिरती बूंदों पर आलम्बन हो
नवगर्भित सरस विहस नवसंवत्सर हो....

-सुनील कुमार दूबे....


2 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ख़ुशी हुई आपका ब्लॉग देखकर... बधाई और शुभकामनाएं...

    आपके सुन्दर विचार सबके समक्ष होंगे।

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. धन्यवाद भाई साहब.... अभी मैं लेखन में बहुत प्रवीण नहीं हूँ.. आप सभी का सहयोग रहा तो शायद कुछ अच्छा प्रयास कर सकूं..

      हटाएं