"सुबह की खिली रंगत में शाम का हुनर नज़र आता है.
उनके हर लफ्ज़ से जमीन और निगाह से आसमान नज़र आता है.."
उनके हर लफ्ज़ से जमीन और निगाह से आसमान नज़र आता है.."
"उनकी पेशानी पे जो दाग हैं, शायद सजदे के हैं.
हमें तो उस दाग में भी चाँद नज़र आता है.."
हमें तो उस दाग में भी चाँद नज़र आता है.."
"मुल्क उनका यह भी है और वो भी था..
जहाँ से उनका बिस्तर उठ के सरे राह शहर आता है."
जहाँ से उनका बिस्तर उठ के सरे राह शहर आता है."
"क़त्ल उनका सफाई से किया गया होगा शायद..
इसीलिए उनके ऐतबार में भी, पैबंद नज़र आता है.."
इसीलिए उनके ऐतबार में भी, पैबंद नज़र आता है.."
"हमने आसमानी रौशनी से क्या खूब, बहार पायी है..
अब ये नीम अँधेरा भी हमें क्यों कर डराता है..."
अब ये नीम अँधेरा भी हमें क्यों कर डराता है..."
"रास्ते हँसते हैं हम पर, पर मौज में हम भी हैं साहिल.
किनारा जर्रा है, तू भी, क्यों आज शरमाता है..."
किनारा जर्रा है, तू भी, क्यों आज शरमाता है..."
"वक़्त उनका बदला है तो क्या, वो भी तो बदले होंगे थोडा सा..
इस खानाबदोश हया से, आज क्यों जी मेरा घबराता है."
इस खानाबदोश हया से, आज क्यों जी मेरा घबराता है."
"सर पर तकिया मिले न मिले, मंजर से एहतियात है मेरा..
इस जामीने शौक से, ये 'सरार' क्यों बावस्ता है.."
इस जामीने शौक से, ये 'सरार' क्यों बावस्ता है.."
-सुनील 'सरार' भारद्वाज
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