एक शुरुआत करनी है,
पुनुरुद्धार और नवनिर्माण की,
नवचेतना के अक्षत स्पंदन की,
अकुलाये और अधीर मन के व्यथित भाव से उत्पन्न
तरंगों के सम्प्रेषण की..
फिर चाहे शून्य से संगम हो
अंतरिक्ष में विचरण हो
मानव मन से ऊष्ण, रुष्ट तटबंधन हो
गिरती बूंदों पर आलम्बन हो
नवगर्भित सरस विहस नवसंवत्सर हो....
-सुनील कुमार दूबे....
पुनुरुद्धार और नवनिर्माण की,
नवचेतना के अक्षत स्पंदन की,
अकुलाये और अधीर मन के व्यथित भाव से उत्पन्न
तरंगों के सम्प्रेषण की..
फिर चाहे शून्य से संगम हो
अंतरिक्ष में विचरण हो
मानव मन से ऊष्ण, रुष्ट तटबंधन हो
गिरती बूंदों पर आलम्बन हो
नवगर्भित सरस विहस नवसंवत्सर हो....
-सुनील कुमार दूबे....