गुरुवार, 24 जुलाई 2014

हांसिये पर तिरछी नज़र

हांसिये पर तिरछी नज़र ::-
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जब व्यक्ति पद और प्रतिष्ठा से विभूषित होकर समाज में अपने अहंकार से जन आचरण करता है तो उससे ऐसी गलती आमतौर पर हो ही जाती है जैसा कि अभी हाल फिलहाल सांसद “राजन विचारे” से हो गयी है.. सांसदों, विधायको और माननीयों द्वारा ऐसा पहली बार नहीं हो रहा है. इसी का परिणाम है कि हम (आम जनता) ने दशकों में यह काबिलियत हासिल की है कि ऐसे व्यक्तिओं द्वारा किये गए व्यवहार से एक झूठी हंसी के साथ मनोरंजन ढूंढ ही लेते हैं...

लेकिन बौद्धिकता का नकाब लगाये जब हम सोचना शुरू करते हैं तो इन घटनाओं से कोई न कोई निष्कर्ष निकाल ही लेते हैं. आज मैंने भी अपनी बौद्धिक क्षमता का प्रयोग किया हालांकि इसका मुझे नैतिक अधिकार नहीं है क्यों कि एक आम नागरिक की हैसियत से समाज के विद्रूप और कुरूप संरचना पर मेरा (आम जनता) का सोचना प्रतिबंधित है. सोचना-विचारना मेरा काम नहीं है उसके लिए संसद में सांसद हैं, विधानसभा में विधायक हैं, विभाग में साहब लोग हैं, गाँव में प्रधान-सरपंच है, घर में एक अदद बीबी है... इसलिए इन कामों में मुझे (आम जनता) को कभी सिर-खपाई नहीं करनी पड़ती है...

फिर भी गैर कानूनी रूप से मैंने खूब सोचा... सोचते-सोचते इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि यदि कभी हमें जन-व्यवहार के चलते किसी को अपमानित करना हो, किसी को अपशब्द कहने हों, किसी को भौतिक रूप से मारना-पीटना हो, कहीं कोई वक्तव्य देना हो, कहीं भाषण देना हो, मीडिया से मुखातिब होना हो तो सर्व प्रथम बाबा रामदेव के “कपाल भारती” आसन को करते हुए जोर-जोर से सांस खींचे और छोड़ें... इससे आपका रक्त संचार संतुलित होगा और “क्रोध” कुछ कम हो जायेगा. फिर सामनेवाले से उसकी नागरिकता, धर्म, जाति और गोत्र के बारे में दरियाफ्त करें.. फिर उसके व्रत-उपवास की जानकारी लें और उसका पारिवारिक बैक-ग्राउंड टटोलें... ऐसा करने से आपका क्रोध सदन में “चढ़ते विपक्षी तेवर” से भी तेज गति से नीचे आएगा.... यूँ आप विवादित कार्य और व्यवहार से बच जायेंगे. और बाद में थूक कर चाटना (माफ़ी माँगना) नहीं पड़ेगा..
(जनहित में जारी)
वैधानिक चेतावनी ::- इस लेख की भाषा अथवा अर्थ को किसी व्यक्ति, धर्म और जाति से जोड़ कर न समझें क्यों कि समझना भी आपका नैतिक अधिकार नहीं है.

रविवार, 1 जून 2014

एक शुरुआत करनी है,
पुनुरुद्धार और नवनिर्माण की,
नवचेतना के अक्षत स्पंदन की,
अकुलाये और अधीर मन के व्यथित भाव से उत्पन्न
तरंगों के सम्प्रेषण की..

फिर चाहे शून्य से संगम हो
अंतरिक्ष में विचरण हो
मानव मन से ऊष्ण, रुष्ट तटबंधन हो
गिरती बूंदों पर आलम्बन हो
नवगर्भित सरस विहस नवसंवत्सर हो....

-सुनील कुमार दूबे....