बुधवार, 21 जनवरी 2015

"सुराज आया"

जब पथिक ने, राह में, निःश्वास लेकर,
आह भर कर, शीश सीने पे झुकाया.

पिघले हुए से, शब्द कानो में पड़े ज्यों,
रात की पहले प्रहर में, सुराज आया.

सुराज आया, सुराज आया, सुराज आया.....(1)

सप्तरंगी हिमधनुष से, आखेट करने,
सहम कर, पग धरा पर, धर को आतुर.

भोर में, कलियों के पीछे, तितलियों सा.
वक्त के आगे से फिसला, पैगाम आया.

सुराज आया, सुराज आया, सुराज आया.....(2)

हीम-शीतित, इस धरा पर सुप्त मानव.
लोक नायक, कुछ झुका पर शीश ताने.

एक लकड़ी से सहारा बुन रहा वो.
संकल्प सा उसने किया जो, ले उठाया.

सुराज आया, सुराज आया, सुराज आया.....(3)

दिग-दिगन्तर, नभ-चिरंतर हाय ये क्या ?
निर्जला वो पलक भीगी, कंठ में आवेश भर कर.

एक पताका, स्वर्ण पाती, नाद में आकाश भर कर.
वह मनुज था, दीन सी उसकी थी काया.
सुराज लाया, सुराज लाया, सुराज लाया......(4)

-सुनील कुमार दूबे.
दिनांक..21 जनवरी 2015

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