गुरुवार, 11 दिसंबर 2014

एहसास

मौसम बदल जाता है....
कभी धूप होती है तेज़..
कभी उमस कर देती है बेचैन...
कभी पानी की फुहारें देती हैं मन को तसल्ली...
कभी रिमझिम कर देती है बेघर....
कभी सर्दियां बहारों का सन्देश देती हैं...
पतझड़ के बाद...
कभी पर्वतों से उतरी सर्द हवाएं,
हड्डियाँ बजाती हैं...
फूल खिलते हैं मुरझाते हैं...
बीज बनते ही बिखर जाते हैं....
जिंदगी ऐसे ही फैलती-सिकुड़ती है...
मौसम बदल जाते हैं लेकिन,
जिंदगी नहीं बदलती...
हर दिन सुबह उठती है...
हर शाम थक कर सो जाती है...
इस जिंदगी का काम मौज की तरह होता है..
जैसे सागर की मौज......
उठती है फिर गिरती है...
फिर और ऊँचा उठती है...
लेकिन इंसानियत का क्या कहना दोस्तों...
ये तो रोज गिरती है, सिर्फ गिरती है....
कोई इसे 'मलाला' सा बना दे..
जो इसे उठा कर बुलंदियों तक पहुंचा दे...
'कैलाश' के पास तक....
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-सुनील कुमार दुबे...(11 दिसम्बर 2014)

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