शनिवार, 2 अगस्त 2014

जीवन का सफ़र......

बहुत हो चुका 'आपका' और 'मेरा'
'मेरा' और 'आपका' अन्तर
अब मन से मन मिल जाने दो
बह जाने दो प्रेम का निर्झर
एक हो जाने दो 'आत्मा'
मिल कर बन जाने दो एकात्मा
तभी तो मिल पायेगा 'परमात्मा'

खेल ही खेल में, थोड़ी देर के लिए
विस्मृत कर दो अपने अहम् को,
और, छोड़ दो अपने आपको निश्चल
पा लो अविरल परम ब्रह्म को...

-सुनील कुमार दुबे
(30 सितम्बर 1995, स्थान-गोरखपुर)

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