बुधवार, 6 अगस्त 2014

अधूरी कविता...

हे ईश्वर!!
तूने क्यों की सृष्टि की रचना...??
क्यों बनाया मानव.?
क्यों दी मानव को अदभुत शक्ति.?
क्यों बनाया मानव को भष्मासुर.?
क्यों नहीं प्रेम का बीज बोया दिलों में.?
घृणा की क्यों की रचना..???
रह जाने देता मानव को अजन्मा...

अभी भी क्षीण सी आशाएं हैं शेष...
हे ईश्वर खोल दे तू तीसरा नेत्र..
उठा ले सुदर्शन, त्रिशूल और ब्रह्मास्त्र ...
मिटा दे घृणा और बुराई को आज...
मानव को बना दे सच्चे अर्थों में मानव...
जिसमें न घृणा हो, न बुराई...
जो हो सिर्फ प्रेम का पुजारी...
जो कर सके सभी से शाश्वत प्रेम...
मान सके तेरी अदभुत सत्ता..
और जान सके तेरी महत्ता...

--अधूरी कविता.. सुनील कुमार दुबे (07 जुलाई 1995)

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