रविवार, 10 मई 2015

यूँ ही एकांत मन से..

"सुबह की खिली रंगत में शाम का हुनर नज़र आता है.
उनके हर लफ्ज़ से जमीन और निगाह से आसमान नज़र आता है.."
"उनकी पेशानी पे जो दाग हैं, शायद सजदे के हैं.
हमें तो उस दाग में भी चाँद नज़र आता है.."
"मुल्क उनका यह भी है और वो भी था..
जहाँ से उनका बिस्तर उठ के सरे राह शहर आता है."
"क़त्ल उनका सफाई से किया गया होगा शायद..
इसीलिए उनके ऐतबार में भी, पैबंद नज़र आता है.."
"हमने आसमानी रौशनी से क्या खूब, बहार पायी है..
अब ये नीम अँधेरा भी हमें क्यों कर डराता है..."
"रास्ते हँसते हैं हम पर, पर मौज में हम भी हैं साहिल.
किनारा जर्रा है, तू भी, क्यों आज शरमाता है..."
"वक़्त उनका बदला है तो क्या, वो भी तो बदले होंगे थोडा सा..
इस खानाबदोश हया से, आज क्यों जी मेरा घबराता है."
"सर पर तकिया मिले न मिले, मंजर से एहतियात है मेरा..
इस जामीने शौक से, ये 'सरार' क्यों बावस्ता है.."
-सुनील 'सरार' भारद्वाज

गुरुवार, 5 फ़रवरी 2015

तपता

कवि जैसी कल्पनाओं से बाहर निकल.
यूँ धूप से बच के, अलक की बूँद सा.
कुछ तप्त-मन में नमी से रीझा हुआ मन.
रे बावरे, तू क्यों उदास है.?

हर तरफ छाँव पर ये घनी आकुल.
गुल्लकें भरता रहा, किलकारियों सा.
पटल पे मन फिर भी अग्नि सी तपन..
रे बावरे, तू क्यों उदास है.?
- सुनील कुमार दुबे
   05 फ़रवरी 2015 

बुधवार, 21 जनवरी 2015

"सुराज आया"

जब पथिक ने, राह में, निःश्वास लेकर,
आह भर कर, शीश सीने पे झुकाया.

पिघले हुए से, शब्द कानो में पड़े ज्यों,
रात की पहले प्रहर में, सुराज आया.

सुराज आया, सुराज आया, सुराज आया.....(1)

सप्तरंगी हिमधनुष से, आखेट करने,
सहम कर, पग धरा पर, धर को आतुर.

भोर में, कलियों के पीछे, तितलियों सा.
वक्त के आगे से फिसला, पैगाम आया.

सुराज आया, सुराज आया, सुराज आया.....(2)

हीम-शीतित, इस धरा पर सुप्त मानव.
लोक नायक, कुछ झुका पर शीश ताने.

एक लकड़ी से सहारा बुन रहा वो.
संकल्प सा उसने किया जो, ले उठाया.

सुराज आया, सुराज आया, सुराज आया.....(3)

दिग-दिगन्तर, नभ-चिरंतर हाय ये क्या ?
निर्जला वो पलक भीगी, कंठ में आवेश भर कर.

एक पताका, स्वर्ण पाती, नाद में आकाश भर कर.
वह मनुज था, दीन सी उसकी थी काया.
सुराज लाया, सुराज लाया, सुराज लाया......(4)

-सुनील कुमार दूबे.
दिनांक..21 जनवरी 2015

गुरुवार, 11 दिसंबर 2014

एहसास

मौसम बदल जाता है....
कभी धूप होती है तेज़..
कभी उमस कर देती है बेचैन...
कभी पानी की फुहारें देती हैं मन को तसल्ली...
कभी रिमझिम कर देती है बेघर....
कभी सर्दियां बहारों का सन्देश देती हैं...
पतझड़ के बाद...
कभी पर्वतों से उतरी सर्द हवाएं,
हड्डियाँ बजाती हैं...
फूल खिलते हैं मुरझाते हैं...
बीज बनते ही बिखर जाते हैं....
जिंदगी ऐसे ही फैलती-सिकुड़ती है...
मौसम बदल जाते हैं लेकिन,
जिंदगी नहीं बदलती...
हर दिन सुबह उठती है...
हर शाम थक कर सो जाती है...
इस जिंदगी का काम मौज की तरह होता है..
जैसे सागर की मौज......
उठती है फिर गिरती है...
फिर और ऊँचा उठती है...
लेकिन इंसानियत का क्या कहना दोस्तों...
ये तो रोज गिरती है, सिर्फ गिरती है....
कोई इसे 'मलाला' सा बना दे..
जो इसे उठा कर बुलंदियों तक पहुंचा दे...
'कैलाश' के पास तक....
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-सुनील कुमार दुबे...(11 दिसम्बर 2014)

बुधवार, 6 अगस्त 2014

अधूरी कविता...

हे ईश्वर!!
तूने क्यों की सृष्टि की रचना...??
क्यों बनाया मानव.?
क्यों दी मानव को अदभुत शक्ति.?
क्यों बनाया मानव को भष्मासुर.?
क्यों नहीं प्रेम का बीज बोया दिलों में.?
घृणा की क्यों की रचना..???
रह जाने देता मानव को अजन्मा...

अभी भी क्षीण सी आशाएं हैं शेष...
हे ईश्वर खोल दे तू तीसरा नेत्र..
उठा ले सुदर्शन, त्रिशूल और ब्रह्मास्त्र ...
मिटा दे घृणा और बुराई को आज...
मानव को बना दे सच्चे अर्थों में मानव...
जिसमें न घृणा हो, न बुराई...
जो हो सिर्फ प्रेम का पुजारी...
जो कर सके सभी से शाश्वत प्रेम...
मान सके तेरी अदभुत सत्ता..
और जान सके तेरी महत्ता...

--अधूरी कविता.. सुनील कुमार दुबे (07 जुलाई 1995)

शनिवार, 2 अगस्त 2014

परछाई...

सुनसान रास्तों पर चलते कदम
अचानक रुक गए.
सामने थी मेरी परछाई....
उसने मुझसे आँखे मिलाई
और पूंछा....
"जा तो रहे हो लेकिन,
मुझे साथ क्यों ले जा रहे हो??
मुझे तो छोड़ जाते और शायद
मेरे लिए ही वापस जल्दी आते
और मैं तब तक
तुम्हारा इंतज़ार करती
वहाँ!!!! क्षितिज के पीछे.."

-सुनील कुमार दुबे
(03 अप्रैल 1992, स्थान-पडरौना)

जीवन का सफ़र......

बहुत हो चुका 'आपका' और 'मेरा'
'मेरा' और 'आपका' अन्तर
अब मन से मन मिल जाने दो
बह जाने दो प्रेम का निर्झर
एक हो जाने दो 'आत्मा'
मिल कर बन जाने दो एकात्मा
तभी तो मिल पायेगा 'परमात्मा'

खेल ही खेल में, थोड़ी देर के लिए
विस्मृत कर दो अपने अहम् को,
और, छोड़ दो अपने आपको निश्चल
पा लो अविरल परम ब्रह्म को...

-सुनील कुमार दुबे
(30 सितम्बर 1995, स्थान-गोरखपुर)